नितिन नबीन को बीजेपी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने के बाद पश्चिम बंगाल चुनाव 2026 की चर्चा तेज हो गयी है. राजनीतिक विशेषज्ञ डॉक्टर संजय कुमार कहते हैं कि ‘बीजेपी बिहार के तर्ज पर बंगाल को भी जीतना चाहती है. पश्चिम बंगाल में कायस्थ वोटर को साधने के लिए बीजेपी ने यह फैसला लिया है. नितिन नबीन भी कायस्थ समुदाय से आते हैं.
पश्चिम बंगाल में कायस्थ समुदाय की अच्छी खासी आबादी है. 2011 के जनगणना के अनुसार पश्चिम बंगाल की कुल आबादी 91 करोड़ 3 लाख 47 हजार 736 के आसपास थी. इसमें 27 से 50 लाख के बीच कायस्थों की आबादी है. कुल आबादी के 15-20% ब्राह्मण, वैद्य और कायस्थ हैं. 27 प्रतिशत अनुसूचित जातियां और मुसलमान, वहीं 2.14 करोड़ के आसपास दलित की भागीदारी है.
राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि इस आंकड़ों के अनुसार पश्चिम बंगाल चुनाव में ब्राह्मण, वैद्य और कायस्थ जाति के वोटर निर्णायक की भूमिका में होते हैं. इन्हें भद्रलोक भी कहा जाता है. भद्रलोक यानि बंगाल का एक विशिष्ट, शिक्षित और अभिजात्य समाज, जो ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में उभरे. इन्होंने प्रशासन, साहित्य और संस्कृति में प्रभुत्व स्थापित किया.
इसका उदाहरण तब देखने को मिलता है जब, 37 साल तक बंगाल में कायस्थ समुदाय से आने वाले मुख्यमंत्री की सरकार रही. बिधान चंद्र राय भी कायस्थ समुदाय से आते हैं. कांग्रेस की सरकार में 23 जनवरी 1948-1 जुलाई 1962 तक पश्चिम बंगाल दूसरे मुख्यमंत्री के रूप में काम किया. कुल 14 वर्ष तक पद पर बने रहें.
दूसरे कायस्थ समुदाय से आने वाले सीसीआई नेता ज्योति बसु थे, जो सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री बने रहे. ज्योति बसु पश्चिम बंगाल के पहले डिप्टी सीएम भी रह चुके हैं. 25 फरवरी 1969-16 मार्च 1970 तक इन्होंने डिप्टी सीएम के रूप में काम किया. इसके बाद राज्य के छठे सीएम 21 जून 1977-5 नवंबर 2000 तक सत्ता में बने रहे.
कुल मिलाकर 37 साल तक बंगाल में भद्रलोक ने सत्ता चलायी. सुभाष चंद्र बोस, स्वामी विवेकानंद जैसे हस्ती भी कायस्थ समुदाय से आते थे. ऐसे में राजनीतिक विशेषज्ञ डॉक्टर संजय कुमार का मानना है कि बंगाल में अगर सत्ता में आना है तो भद्रलोक में पैठ बनानी होगी.
